सिंधु घाटी सभ्यता- 3300-1400 ई.पू.[UPSC के लिए प्राचीन भारतीय इतिहास नोट्स]

सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) लगभग 2500 ईसा पूर्व फली-फूली, जिसे अक्सर परिपक्व सिंधु घाटी सभ्यता की उम्र कहा जाता है। यह भारतीय सभ्यता की रीढ़ है क्योंकि यह दुनिया की प्रमुख सभ्यताओं में से एक है। IAS परीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण विषय, सिंधु घाटी सभ्यता को उम्मीदवारों द्वारा अच्छी तरह से पढ़ा जाना चाहिए।

try UPSC का यह लेख आपको Indus Valley Civilization पर NCERT short notes प्रदान करेगा।

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यूपीएससी के लिए सिंधु घाटी सभ्यता के नोट
यूपीएससी के लिए सिंधु घाटी सभ्यता के नोट

यूपीएससी के लिए सिंधु घाटी सभ्यता के नोट

  • सिंधु सभ्यता की स्थापना लगभग 3300 ईसा पूर्व हुई थी। यह 2600 ईसा पूर्व और 1900 ईसा पूर्व (परिपक्व सिंधु घाटी सभ्यता) के बीच फला-फूला। किन्तु यह 1900 ईसा पूर्व के आसपास घटने लगा और लगभग 1400 ईसा पूर्व आते आते यह पूरी सभ्यता गायब हो गयी।
  • खुदाई में मिले पहले शहर के नाम पर इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता (hadappa sabhyata) भी कहा जाता है,
  • हड़प्पा की वर्तमान स्थिति पंजाब, पाकिस्तान में है।
  • पाकिस्तान के मेहरगढ़ में हड़प्पा के पहले की सभ्यता पाई गई है, जहा कपास की खेती के पहले सबूत दिखाई देते है।
  • इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा और राखीगढ़ी इसके प्रमुख केन्द्र थे। दिसम्बर 2014 में भिरड़ाणा को सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है। ब्रिटिश काल में हुई खुदाइयों के आधार पर पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यन्त(अत्यंत) विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं।
Indus Valley Civilization Map
Indus Valley Civilization Map

सिंधु सभ्यता महत्वपूर्ण स्थल

प्रमुख शहर

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल निम्न है

  1. हड़प्पा (पंजाब पाकिस्तान)
  2. मोहेनजोदड़ो (सिंध पाकिस्तान लरकाना जिला)
  3. लोथल (गुजरात)
  4. कालीबंगा( राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में)
  5. बनवाली (हरियाणा के फतेहाबाद जिले में)
  6. आलमगीरपुर( उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में)
  7. सूत कांगे डोर( पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में)
  8. कोट दीजी( सिंध पाकिस्तान)
  9. चन्हूदड़ो ( पाकिस्तान )
  10. सुरकोटदा (गुजरात के कच्छ जिले में)

हिन्दुकुश पर्वतमाला के पार अफगानिस्तान में

  1. शोर्तुगोयी – यहाँ से नहरों के प्रमाण मिले है
  2. मुन्दिगाक जो महत्वपूर्ण है

भारत में

भारत के विभिन्न राज्यों में सिंधु घाटी सभ्यता के निम्न शहर है

गुजरातहरियाणापंजाबमहाराष्ट्रराजस्थानजम्मू कश्मीर
लोथल
सुरकोटडा
रंगपुर
रोजी
मालवद
देसूल
धोलावीरा
प्रभातपट्टन
भगतराव
राखीगढ़ी
भिरड़ाणा
बनावली
कुणाल
मीताथल
रोपड़ (पंजाब)
बाड़ा
संघोंल (जिला फतेहगढ़)
दायमाबाद।
बनावली
कुणाल
मीताथल
कालीबंगामांडा
  • 7वीं शताब्दी में पहली बार जब लोगो ने पंजाब प्रान्त(प्रांत) में ईटो के लिए मिट्टी की खुदाई की तब उन्हें वहाँ से बनी बनाई ईंटें मिली जिसे लोगो ने भगवान का चमत्कार माना और उनका उपयोग घर बनाने में किया उसके बाद 1826 में चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता को खोजा।
  •  कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया।
  • 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बंधुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी।
  • इसी क्रम में 1861 में एलेक्जेण्डर कनिंघम(कनिङ्घम) के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की गयी।
  • 1902 में लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग का महानिदेशक बनाया गया।
  • 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया। इस प्रकार इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया।
  • मोहनजोदड़ो के खोज के कारण राखलदास बेनर्जी को मोहनजोदड़ो का खोजकर्ता माना गया।

नगर निर्माण योजना

  • इस सभ्यता की सबसे विशेष बात थी यहाँ की विकसित नगर निर्माण योजना।
  • हड़प्पा तथा मोहन् जोदड़ो दोनो नगरों के अपने दुर्ग थे जहाँ शासक वर्ग का परिवार रहता था।
  • प्रत्येक नगर में दुर्ग के बाहर एक उससे निम्न स्तर का शहर था जहाँ ईंटों के मकानों में सामान्य लोग रहते थे।
  • इन नगर भवनों के बारे में विशेष बात ये थी कि ये जाल की तरह विन्यस्त थे। यानि सड़के एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं और नगर अनेक आयताकार खंडों में विभक्त हो जाता था।
  • ये बात सभी सिन्धु बस्तियों पर लागू होती थीं चाहे वे छोटी हों या बड़ी। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के भवन बड़े होते थे। वहाँ के स्मारक इस बात के प्रमाण हैं कि वहाँ के शासक मजदूर जुटाने और कर-संग्रह में परम कुशल थे। ईंटों की बड़ी-बड़ी इमारत देख कर सामान्य लोगों को भी यह लगेगा कि ये शासक कितने प्रतापी और प्रतिष्ठावान थे।
  • मोहनजोदड़ो का अब तक का सबसे प्रसिद्ध स्थल है विशाल सार्वजनिक स्नानागार, जिसका जलाशय दुर्ग के टीले में है। यह ईंटो के स्थापत्य का एक सुन्दर उदाहरण है। 
  • हड़प्पा के दुर्ग में छः कोठार मिले हैं जो ईंटों के चबूतरे पर दो पांतों में खड़े हैं।
  • हड़प्पा में दो कमरों वाले बैरक भी मिले हैं जो शायद मजदूरों के रहने के लिए बने थे।
  • कालीबंगां में भी नगर के दक्षिण भाग में ईंटों के चबूतरे बने हैं जो शायद कोठारों के लिए बने होंगे। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि कोठार हड़प्पा संस्कृति के अभिन्न अंग थे।
  • हड़प्पा संस्कृति के नगरों में ईंट का इस्तेमाल एक विशेष बात है, क्योंकि इसी समय के मिस्र के भवनों में धूप में सूखी ईंट का ही प्रयोग हुआ था। समकालीन मेसोपेटामिया में पक्की ईंटों का प्रयोग मिलता तो है पर इतने बड़े पैमाने पर नहीं जितना सिन्धु घाटी सभ्यता में।
  • मोहन जोदड़ो की जल निकास प्रणाली अद्भुत थी। लगभग हर नगर के हर छोटे या बड़े मकान में प्रांगण और स्नानागार होता था।
  • कालीबंगा के अनेक घरों में अपने-अपने कुएं थे। घरों का पानी बहकर सड़कों तक आता जहाँ इनके नीचे मोरियाँ (नालियाँ) बनी थीं। अक्सर ये मोरियाँ ईंटों और पत्थर की सिल्लियों से ढकीं होती थीं। सड़कों की इन मोरियों में नरमोखे भी बने होते थे। सड़कों और मोरियों के अवशेष बनावली में भी मिले हैं।

कृषि एवं पशुपालन

  • सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग गेंहू, जौ, राई, मटर, ज्वार आदि अनाज पैदा करते थे।
  • वे दो किस्म की गेँहू पैदा करते थे।
  • बनावली में मिला जौ उन्नत किस्म का है।
  • इसके अलावा वे तिल और सरसों भी उपजाते थे।
  • सबसे पहले कपास भी यहीं पैदा की गई। इसी के नाम पर यूनान के लोग इस सिन्डन (Sindon) कहने लगे।
  • हड़प्पा एक कृषि प्रधान संस्कृति थी पर यहाँ के लोग पशुपालन भी करते थे।
  •  बैल-गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअर पाला जाता था। हड़प्पाई लोगों को हाथी तथा गैंडे का ज्ञान था।
  • इन लोगों को घोड़े और लोहे की जानकारी नहीं थी।

उद्योग-धंधे

यहाँ के नगरों में अनेक व्यवसाय-धन्धे प्रचलित थे।

  • मिट्टी के बर्तन बनाने में ये लोग बहुत कुशल थे। मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग से भिन्न-भिन्न प्रकार के चित्र बनाये जाते थे।
  • कपड़ा बनाने का व्यवसाय उन्नत अवस्था में था। उसका विदेशों में भी निर्यात होता था।
  • जौहरी का काम भी उन्नत अवस्था में था। मनके और ताबीज बनाने का कार्य भी लोकप्रिय था, अभी तक लोहे की कोई वस्तु नहीं मिली है। अतः सिद्ध होता है कि इन्हें लोहे का ज्ञान नहीं था।

व्यापार

  • यहाँ के लोग आपस में पत्थर, धातु शल्क (हड्डी) आदि का व्यापार करते थे।
  • एक बड़े भूभाग में ढेर सारी सील (मृन्मुद्रा), एकरूप लिपि और मानकीकृत माप तौल के प्रमाण मिले हैं।
  • वे चक्के से परिचित थे और संभवतः आजकल के इक्के (रथ) जैसा कोई वाहन प्रयोग करते थे।
  • ये अफ़ग़ानिस्तान और ईरान (फ़ारस) से व्यापार करते थे। उन्होंने उत्तरी अफ़गानिस्तान में एक वाणिज्यिक उपनिवेश स्थापित किया जिससे उन्हें व्यापार में सहूलियत होती थी।
  • बहुत सी हड़प्पाई सील मेसोपोटामिया में मिली हैं जिनसे लगता है कि मेसोपोटामिया से भी उनका व्यापार सम्बंध था। 
  • मेसोपोटामिया के अभिलेखों में मेलुहा के साथ व्यापार के प्रमाण मिले हैं साथ ही दो मध्यवर्ती व्यापार केन्द्रों का भी उल्लेख मिलता है – दिलमुन और माकन। दिलमुन की पहचान शायद फ़ारस की खाड़ी के बहरीन के की जा सकती है।

धार्मिक जीवन

  • हड़प्पा में पकी मिट्टी की स्त्री मूर्तिकाएं भारी संख्या में मिली हैं। एक मूर्ति में स्त्री के गर्भ से निकलता एक पौधा दिखाया गया है। विद्वानों के मत में यह पृथ्वी देवी की प्रतिमा है और इसका निकट संबंध पौधों के जन्म और वृद्धि से रहा होगा। इसलिए मालूम होता है कि यहाँ के लोग धरती को उर्वरता की देवी समझते थे और इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस तरह मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस् की।
  • कुछ वैदिक सूत्रो में पृथ्वी माता की स्तुति है, धोलावीरा के दुर्ग में एक कुआँ मिला है इसमें नीचे की तरफ जाती सीढ़ियाँ है और उसमें एक खिड़की थी जहाँ दीपक जलाने के सबूत मिलते है। उस कुएँ में सरस्वती नदी का पानी आता था, तो शायद सिंधु घाटी के लोग उस कुएँ के जरिये सरस्वती की पूजा करते थे।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के नगरों में एक सील पाया जाता है जिसमें एक योगी का चित्र है 3 या 4 मुख वाला, कई विद्वान मानते है कि यह योगी शिव है।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपने शवों को जलाया करते थे, 
  • मोहन जोदड़ो और हड़प्पा जैसे नगरों की आबादी करीब 50 हज़ार थी पर फिर भी वहाँ से केवल 100 के आसपास ही कब्रें मिली है जो इस बात की और इशारा करता है वे शव जलाते थे।
  • लोथल, कालीबंगा आदि जगहों पर हवन कुण्ड मिले है जो की उनके वैदिक होने का प्रमाण है। यहाँ स्वास्तिक के चित्र भी मिले है।
IndusValleySeals swastikas.JPG

शिल्प और तकनीकी ज्ञान

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सिंधु घाटी सभ्यता का पतन

यह सभ्यता मुख्यतः 2600 ई॰पू॰ से 1900 ई॰पू॰ तक रही। ऐसा आभास होता है कि यह सभ्यता अपने अंतिम चरण में ह्रासोन्मुख थी। इस समय मकानों में पुरानी ईंटों के प्रयोग की जानकारी मिलती है। इसके विनाश के कारणों पर विद्वान सहमत नहीं हैं।

  • वाल्मिकि रामायण के उत्तरकाण्ड के १००वां और १०१वां सर्ग मे है कि सिन्धु नदी और उसके तट पर बसे गन्धर्वों से राम के भाई भरत ने अपने पुत्र तक्ष के लिये भीषण युद्ध किया था जो सात दिन और सात रात तक चलता रहा।
  •  सिन्धु घाटी सभ्यता के अवसान के पीछे विभिन्न तर्क दिये जाते हैं जैसे: आक्रमण, जलवायु परिवर्तन एवं पारिस्थितिक असंतुलन, बाढ़ तथा भू-तात्विक परिवर्तन, महामारी, आर्थिक कारण आदि।
  • ऐसा लगता है कि इस सभ्यता के पतन का कोई एक कारण नहीं था बल्कि विभिन्न कारणों के मेल से ऐसा हुआ। जो अलग-अलग समय में या एक साथ होने कि सम्भावना है।
  • मोहनजोदड़ो में नग‍र और जल निकास कि व्यवस्था से महामारी कि सम्भावना कम लगती है। भीषण अग्निकान्ड के भी प्रमाण प्राप्त हुए है।
  • मोहनजोदड़ो के एक कमरे से १४ नर कंकाल मिले है जो आक्रमण, आगजनी, महामारी के संकेत है।

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